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पुरुष ! एक अनकही दास्तां

रीता राजपूत जी द्वारा लिखित विचार - NRI हेराल्ड हिन्दी द्वारा प्रकाशित , 23 July 2021


(समय के साथ परिस्थितियाँ और सोच में बदलाव आया है। ज़रूरी नहीं कि यह रचना सभी के जीवन से मेल खाती हो। लेकिन अधिकतर पुरुषों का वर्चस्व समाज में ऐसा ही दिखाई देता है।)

आज अचानक ही बेटी ने एक बात कह दी। जिसे सुनकर मै सोचने पर मजबूर हो गई ! - मम्मी , पुरूषों के जीवन-संघर्ष पर कुछ क्यों नहीं लिखती ? सब स्त्रियों पर ही लिखते हैं! पुरूषों का जीवन भी तो कितना चुनौतीपूर्ण होता है! सच , मैंने तो कभी इस ओर विशेष रूप से ध्यान ही नही दिया।


बचपन से ही लड़कों से लड़कियों की अपेक्षा अधिक दृढ़ और साहसी होने की अपेक्षा की जाती है। भारी वस्तुओं को उठाने से लेकर विपरीत परिस्थितियों में कभी न घबराना तो जैसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार - सा मान लिया जाता है ।

’अरे , तुम लड़के होकर इतना - सा काम नही कर सकते ! कैसे मर्द हो? इससे डर गए ! ‘जैसे पुरुष योनि में जन्म लेना मतलब डायनासोर बन जाना होता हो !

यूँ तो काबिल शख़्सियत सभी की नज़रों में चढ़ी होती है लेकिन अधिकतर परिस्थितियों में उनकी क़ाबिलियतें जिम्मदारियों के बोझ तले दबाती जाती है। घर के सभी सदस्यों में बुद्धिमान सदस्य की जान सिर्फ़ इसलिए आफ़त में आयी होती है कि वह सारे काम निपुणता से कर लेता है । दरअसल कोई भी व्यक्ति रिस्क नही लेना चाहता। इसलिए सारे काम परफ़ेक्ट बंदे को सौंप कर, निश्चिंत होना चाहता है, फिर चाहे इस सब के पीछे काम करने वाले के प्राण ही क्यूँ ना निकल जाएँ !


बेटे से माता-पिता की उम्मीदें, भाई से भाई- बहनों की उम्मीदें , पिता से बच्चों की, नाना- दादा से नाती - पोतों की, पति से पत्नी की, कर्मचारी से अफ़सर की यहाँ तक कि प्रेमिका की प्रेमी से उम्मीदें पूरी करते - करते पुरुष भी तो थक जाता होगा ….!


क्या हम इस बारे में कभी सोचते हैं ?


क्या कभी कोई सोचता होगा उसके अंतर्द्वंद्व के बारे में …!


तलाक़शुदा या पत्नीविहीन पुरुष को भी अकेलापन उतना ही काटता होगा ! उतना ही प्रताड़ित होना पड़ता होगा उसको भी समाज में जितना कि स्त्री को …! कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा-लगाकर उसके भी तो दिल, दिमाग़ ,पैर और जेब - सब थक जाते होंगे ! जवान पुत्र की अर्थी को कंधा देते समय वह भी विधाता से मौत माँगता होगा! घर के सदस्यों को, दुनिया से जाने वाले के लिए सांत्वना देते हुए, उसका हृदय भी तो छलनी हो जाता होगा! संतान के चले जाने का दर्द उसको भी तो उतना ही टीसता होगा …!


पिता , पुत्र और पति की भूमिका निभाते-निभाते वह भी तो अपने अंतर्मन को मारता होगा! बेटे या पति को अगर गाड़ी चलानी आती है तो यह कोई गुनाह तो नही कि जब भी वह घर में थका हारा आए तो आपकी फ़रमाइश पूरी करने के लिए ड्राइवर बनकर आपको बाज़ार या रिश्तेदारों के यहाँ ले जाये। घर के सभी टेक्निकल कामों को करने का तो पुरुष जाति को होश सँभालते ही ठेका मिल जाता है। कमा कर लाना और घर चलाना उसके अनिवार्य कृत्यों में सर्वोपरि माना जाता है ।बेरोज़गार पुरुष को तो धरती का सबसे निकृष्ट प्राणी और बोझ के समान समझा जाता है ।


वह भी तो अपनी इच्छाओं को मारकर समाज में तुम्हें बराबरी का दर्जा दिलाना चाहता होगा ! बिजनेस-प्रमोशन के लिए ज़बरदस्ती दोस्त बनाता होगा ! उसकी भी तो अपनी विचारधारा होती होगी …!

लेकिन आज सब अपने-अपने सुख की तलाश में हैं !

किसी के पास दूसरों के बारे में सोचने का समय नही !


सोच सभी की अलग है, अलग सभी की राह

सबकी अपनी नौकरी सबकी अपनी चाह।

 

रीता राजपूत जी दो दशक से भी ज्यादा हिन्दी की अध्यापिका और DPS इंदिरापुरम, दिल्ली NCR में हिन्दी की विभागाध्यक्ष (HOD) के रूप में अपनी सेवा प्रदान कर चुकी है | हजारों छात्रों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के बाद, रीता जी ने व्यवसाय की दुनिया मे कदम रखा और परिणामस्वरूप आजकल रीता जी Neeta Polycots जोकि एक अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा उत्पादन कंपनी है उसमे मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप मे कार्यरत है.

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