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जाग धरा के मानव जाग !

रीता राजपूत जी द्वारा रचित - NRI हेराल्ड हिन्दी द्वारा प्रकाशित , 30 August 2021

तालिबान के कुकृत्यों से

अफ़ग़ान की धरा पटी है ।

मानवता को खंडित करती

कुछ भेड़ों की भीड़ बढ़ी है ।


आतंकित अफ़ग़ानी सब हैं

उन पर आई विपद बड़ी है ।

हीन कर्म का खंडन करती

‘दुनियाभर’ की नींद उड़ी है ।


जीर्ण-शीर्ण अफ़ग़ानी सारे

करे ‘ख़ुदा’ से यही गुहार -

अबकी ख़ुदा बचा हमको !

हम बालक तेरे लाचार !!


कुछ आतंकी लोग बन गए

लाइलाज-सा रोग बन गए ।

मानवता को मार के अपनी

ज़ाहिलों के शेर बन गए !!


सपनों में दहशत फैला दी

दुनिया में वहशत फैला दी ।

शर्मसार कर दी मानसता

भ्रात भाव की लाश गिरा दी।


सकल भूमंडल तुझे पुकारे

जाग ! धरा के मानव जाग ।

सकल भूमंडल तुझे पुकारे

मानव भर ले, अब हुँकार !!


मानवेन्द्र तू ! राघवेन्द्र तू !

अखिल मही का सर्वश्रेष्ठ तू ।

बंधुभाव का कफ़न पहन कर

कर दे ! आतंकी का नाश !!


सकल भूमंडल तुझे निहारे

जाग ! धरा के मानव जाग !

 

रीता राजपूत जी दो दशक से भी ज्यादा हिन्दी की अध्यापिका और DPS इंदिरापुरम, दिल्ली NCR में हिन्दी की विभागाध्यक्ष (HOD) के रूप में अपनी सेवा प्रदान कर चुकी है | हजारों छात्रों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के बाद, रीता जी ने व्यवसाय की दुनिया मे कदम रखा और परिणामस्वरूप आजकल रीता जी Neeta Polycots जोकि एक अन्तर्राष्ट्रीय कपड़ा उत्पादन कंपनी है उसमे मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप मे कार्यरत है.

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