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संस्कृत भाषा का महत्व।

डॉ. राजबाला चौहान जी द्वारा लिखित - NRI हेराल्ड हिन्दी द्वारा प्रकाशित , 06 September 2021


संस्कृत भाषा की प्राचीनता और उद्गम के विषय में कहना कठिन है परन्तु संस्कृत का प्राचीन रूप ऋग्वेद में देखने को मिलता है। वेद चार कहे गए हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद। वेदों की रचना किसी एक व्यक्ति ने नहीं की बल्कि प्राचीन ऋषि जब ध्यान में बैठते थे तो उन्हें मंत्रों का दर्शन होता था तो वह बोलते और उनके शिष्य संग्रहित कर लेते थे उनका संग्रह ही वेदों में है इसीलिए ऋषि यों को मंत्र दृष्टा और वेदों को वेद संहिता भी कहा जाता है। संस्कृत को देवभाषा,गीर्वाणवाणी अथवा सुरभाषा भी कहा जाता है। बाद में पाणिनि ने संस्कृत भाषा को व्याकरण बद्ध किया तो इसका परिष्कृत रूप सामने आया। पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना की जिसमें संस्कृत भाषा के व्याकरण के सूत्र लिखे।


संस्कृत की लिपि देवनागरी है।


संस्कृत भाषा का साहित्य अत्यंत विशाल है। इसमें ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, एवं अध्यात्म का बड़ा खजाना है। प्राचीन ऋषियों को मन्त्रद्रष्टा कहा जाता था। संस्कृत शब्दों का उच्चारण अत्यंत वैज्ञानिक है। संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। जैसे 'ओम् नमः शिवाय' आदि मंत्रों के उच्चारण से शक्तिशाली तरंगे उत्पन्न होती है जिससे वातावरण शुद्ध होता है और नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। यदि हमें मंत्रों का अर्थ भी समझ न आए तो भी ऋषि यों ने इस तरह से शब्द विन्यास किया है कि उनका प्रभाव शरीर के विभिन्न स्थानों पर एवं वातावरण में और हमारी चेतना पर होगा ही। जब हम मंत्र बोलते हैं तो उन शब्दों की ऊर्जा हमें भी मिलती है क्योंकि हमारी चेतना अत्यंत प्राचीन है और संस्कृत भाषा भी उतनी ही प्राचीन है वह स्वयं ही मंत्रों से जुड़ जाती है।


जब हम यज्ञ हवन आदि करते हैं तो वातावरण पूर्णतया सकारात्मक हो जाता है। ऐसा मानते हैं कि 10 ग्राम देसी गाय का घी जलने से 1 टन ऑक्सीजन उत्पन्न होती है और उससे होने वाले धुएं से कीटाणु भी समाप्त हो जाते हैं। हवन भीतर और बाहर से शुद्धीकरण का ही एक कांड है। पूजा का मतलब है 'पूर्णता' जो हमें पूर्णता की ओर ले जाए वही पूजा है जब हम पूजा अर्चना के श्लोक संस्कृत में उच्चारण करते हैं तो अधिक प्रभावशाली होते हैं संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता सर्व सम्मत है नासा ने तो संस्कृत को कंप्यूटर के लिए सर्वोत्तम उपयुक्त भाषा माना है।


संस्कृत का उच्चारण


संस्कृत का उच्चारण करने से मुंह के प्रत्येक हिस्सों को उपयोग में लाना पड़ता है। संस्कृत के कुछ वर्ण दांत से कुछ तालु से कुछ कंठ से कुछ होठों की मदद से बोले जाते हैं इससे मुंह की सभी नाड़ियों का व्यायाम हो जाता है। विदेशी स्कूलों में तो आजकल बच्चों को संस्कृत पढ़ाना प्रारंभ कर दिया गया है संस्कृत के विभिन्न वर्णों से हमारे सभी चक्र भी प्रभावित होते हैं। उदाहरणतया 'अ' का उच्चारण करने से नीचे के मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र सक्रिय हो हो जाते है 'उ' का उच्चारण करने से अनाहत मध्य चक्र सक्रिय होता है और म् का उच्चारण करने से विशुद्धि और आज्ञा चक्र सक्रिय होते हैं।विसर्ग(:) का उच्चारण करने से कपालभाति योगा और अनुस्वार (ंम्)के उच्चारण से भ्रामरी प्राणायाम स्वत: ही हो जाता है।


हमारे प्राचीन ऋषि मुनि बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। खगोल भूगोल ब्रह्मांड आदि शब्द इसी का प्रमाण है। वे जानते थे पृथ्वी अंडाकार है। वे प्रकृति के इतने निकट थे कि उन्होंने प्रकृति से अपना संबंध ही बना लिया था। वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं थी वे प्रकृति में विद्यमान पांचों तत्वों (पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश)को ही पूजनीय मानते थे। इन्हीं पांचों तत्वों से ही हमारा शरीर भी बना है। 🌹क्षिति जल पावक गगन समीरा पंचतत्व ही रच्यो शरीरा🌹। उन्होंने इस तथ्य को बहुत समीप से देखा और महसूस किया। वे नदियों को मां के रूप में देखते थे क्योंकि उनसे जल ग्रहण करते थे जो जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। पर्वतों को भी देव स्वरूप मानते थे, गोवर्धन पूजा, इसी का प्रमाण है।


पेड़ों को पुत्र के रूप में देखते थे। पृथ्वी को माता का रूप दिया, क्योंकि धरती मां हमारा पालन पोषण करती है। जिसकी गोद में हम पलते हैं बड़े होते हैं और अंत में उसी में मिल जाते हैं। आर्य लोग प्रारंभ में प्राकृतिक शक्तियों की अर्चना करते थे उन्हीं शक्तियों को वरुण देवता, सविता, सूर्य, चंद्रमा, उषा, सरस्वती रूप में आवाहन करते थे और उनकी स्तुति करते थे। वैसे भी जिनसे हमारा नजदीकी संबंध होता हैं उनको हम कभी भी कष्ट नहीं पहुंचा सकते। उनके प्रति सदैव सम्मान और प्रेम ही रहता है। इस भावना के कारण पर्यावरण की रक्षा स्वत: ही हो जाती है। यह अमूल्य ज्ञान हमें अपने ऋषि-मुनियों से विरासत में मिला है। हम प्रकृति के साथ जितना गहरा संबंध बनाते हैं हमारी चेतना का उतना ही विकास होता है, चेतना उतनी ही विस्तृत होने लगती है और हमारा आध्यात्मिक विकास होता है। आज भी लोग पीपल की पूजा करते हैं क्योंकि उससे हमें सबसे अधिक ऑक्सीजन मिलती है। आज के युग में पर्यावरण की रक्षा करना अति आवश्यक है।


संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का आधार है


वेद ,वेदांग,उपनिषद ,पुराण रामायण, महाभारत गीता में अमूल्य ज्ञान का भंडार है। इस अमूल्य निधि की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें सभी ग्रंथों का सार निहित है इसीलिए कहा गया है (गीता सुगीता कर्तव्या कि मन्यै: शास्त्रविस्तरै: या स्वयं पद्मनाभस्यमुख पदमाद्विनिसृता) इसमें गीता का महत्व बताया गया है कि 'यदि हम गीता को समझ ले तो विस्तृत शास्त्रों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गीता स्वयं भगवान के मुखकमल से निकली है।'


गीता का एक-एक श्लोक अध्यात्म और दिन प्रतिदिन काम में आने वाले ज्ञान से भरा है। गीता का यह एक ही श्लोक हमारे जीवन का मूल मंत्र है -(कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।। मा कर्मफलहेतुर्भूमाते संगो अस्त्वकर्मणि) इसका तात्पर्य है कि 'कर्म करो फल की इच्छा मत करो'यदि हम केवल इसे हीअपने जीवन में उतार ले तो पर्याप्त है। यदि हम अपना कार्य 100% प्रयत्नपूर्वक करते हैं और समर्पण कर देते हैं तथा उसके फल मेआसक्ति नहीं रखते। यही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि फल हमारे वश में नहीं है हमारे वश में केवल हमारा कर्म ही है।

 

डॉ. राजबाला चौहान दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में पीएचडी हैं। वह 20 साल पहले 'द आर्ट ऑफ लिविंग' (एक एनजीओ) में शामिल हुईं। इस दौरान आर्ट ऑफ लिविंग की शिक्षिका के रूप में अपनी क्षमता के अनुसार उन्होंने जेलों, गांवों, आवासीय और वाणिज्यिक संगठनों में भी लगभग 200 पाठ्यक्रमों का आयोजन और संचालन किया है। इन्होंने हजारों लोगों के जीवन में बदलाव लाया है। डॉ. राजबाला चौहान ने अपना जीवन आर्ट ऑफ लिविंग को समर्पित कर दिया है और इस प्रक्रिया में हर दिन लोगों के जीवन को बेहतर बना रही है |

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