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क्या भारतीय वायुसेना को रफाएल की जगह सुखोई-57 खरीदना चाहिए था ? पड़िए NRI हेराल्ड मे प्रकाशीत विचार

Updated: Jul 8, 2021

कुनाल सिंह की कलम से NRI Herald मे प्रकाशित , 07 जुलाई 2021

प्रथम विश्व युद्ध का दौर

प्रथम विश्व-युद्ध में लड़ाकू विमानों के प्रयोग ने कई मोर्चों पे युद्ध की गति को बदल दिआ था। प्रथम विश्व युद्ध को ख़तम हुए आज सौ से अधिक वर्ष बीत चुके हैं, और इन सौ वर्षों में युद्ध नीति और आयुध-सञ्चालन में कई बदलाव आ चुके हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय अविष्कृत जेट युद्धक-विमानों ने युद्ध-नीति को हमेशा के लिए बदल दिआ। आगे के युद्धों में थल-सेना के बजाये वायु-सेना उस शक्ति के रूप में उभरी जो युद्ध के परिणाम का निर्धारण कर सके।


स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद भारत सोवियत रूस के करीबी मित्र के रूप में उभरा। 1991 तक चलने वाले शीत-युद्ध में अमेरिका और रूस के बीच बेहतर हथियार बनाने की होड चलती रही। परिणाम स्वरुप भारतीय सेना के पास रूसी मूल के हथियारों की बहुतायत थी। भारतीय वायु-सेना मिग युद्धक-विमानों के सहारे भारतीय सीमा की रक्षा में दशकों तक तत्पर रही। 1991 में सोवियत संघ के विगठन के बाद रूस से आने वाले हथियारों की गुणवत्ता लगातार खराब होती रहीऔर बदलते समय के साथ भारतीय वायु सेना कोशास्त्र-निर्यात करने के लिए एक नए स्रोत की तलाश थी।


पिछले तीस वर्षों में युद्धक-विमानोंकी प्रौद्योगिकी में कई बदलाव आये जिनको ध्यान में रखते हुए भारतीय वायु सेना को चौथी पीढ़ी के विमानों की आवश्यकता का आभास हुआ। पश्चिमी जगत के कई देशों ने अपने विमान भारत को बेचने की कोशिश की मगर सफल हुआ फ्रांस का रफाएल युद्धक-विमान। अपनी क्षमता की वजह से यह विमान चौथी और पांचवी पीढ़ी के बीच का माना जाता है और कई दिग्गजों के अनुसार भारत की सुरक्षा नीति के लिए यह उत्तम शस्त्र है।


इसी बीच कुछ आलोच कों का यह तर्क सामने आया की चौथी पीढ़ी का रफाएल खरीदने के बजाये भारत को रूसी मूल का सुखोई-57 विमान खरीदना चाहिए था जो की पांचवी पीढ़ी का युद्धक-विमान माना जाता है।


क्या है यह पांचवी पीढ़ी का युद्धक-विमान और क्या सच-मुच सुखोई-59 इस पीढ़ी का हथियार है?

सन-80 के दशक में अमरीकी और रूसी दोनों यह समझ गए थेकी भविष्य के युद्धों में एक ऐस विमान की आवश्यकता होगी जो की शत्रु की दृष्टि से बचा रह कर उसका विनाश कर सके। जो विमान अदृश्यता की इस तकनीक का सफल प्रयोग कर पाए वो इस पांचवी-पीढ़ी का कह लाने योग्य होगा। प्रतियोगिता में हैं अमेरिकी मूल के एफ-34 और रूसी मूल के सुखोई-57।


जब रूसी वैज्ञानिकों ने 2004 में सुखोई-57 को पांचवी पीढ़ी का स्टेल्थ विमान के रूप में प्रस्तुत किआ था तब भारत ने इसको बनाने का आधा खर्च उठाने का प्रस्ताव किया था। 2016 में भारत इस उद्यम से अलग हो गया। सोचने वाली बात थी क्यों ? और तार्किक उत्तर था की सुखोई-57 स्टेल्थ विमान है ही नहीं।


स्टेल्थका अर्थ है कीइस विमान को शत्रु देखया महसूस कर ही नसके। यहतब संभव है जबविमान का हेड-ऑनराडार क्रॉस-सेक्शन अत्यंत छोटा हो। सुखोई-57 में यह 1 /2वर्ग मीटर है जबकि फ-34 में यह 1 /1000 वर्ग मीटर है। यूँ समझ लीजिये अगर आप एक मैदान में हैं तो सुखोई-57 का राडार किसी ट्रक के चक्क्के के सामान है और फ-34 का राडार किसी टेबल-टेनिस बॉल के सामान। दूर से ट्रक का पहिया तो किसी को भी दिख जायेगा पर जब तक बहुत ध्यान से ना देखो टेबल-टेनिस का बॉल दीखाई नहीं देगी ।


निष्कर्ष

निष्कर्ष यह है की अगर अदृश्यता की क्षमता विमान में न हो तो सिर्फ नाम में पांचवी पीढ़ी लिखे होने की वजह से इतना महंगा हथियार खरीदने का कोई औचित्य नहीं है। बुद्धिमता इसी में है की कम दाम में चौथी पीढ़ी का कोई हथियार ख़रीदा जाए जिसने युद्ध-भूमि में नाम कमाया हो और जो अभी के परिवेश में भारत की सुरक्षा को दृढ कर सक।


रफाएल इन सभी परिमाणों पर खरा उतरा है और निसंदेह आगे के वर्षों में माँ भारती की रक्षा करता रहेगा। हमारे प्रधानमंत्री ने आत्मा-निर्भरभारत का आवाहन किया है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए की हम अपने बल-बूते पे पांचवी-पीढ़ी का विमान खुद अपने देश में बनाये जो आगे कई दशकों तक हमारे देश की रक्षा करता रहे।


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